हिंदू धर्म में माघ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि, जिसे भीष्म द्वादशी कहा जाता है, का अत्यधिक महत्व है। यह पवित्र दिन भगवान विष्णु और हमारे पूर्वजों, जिन्हें पितर कहते हैं, दोनों को समर्पित है। उपवास, प्रार्थनाओं और अनुष्ठानों के माध्यम से मनाया जाने वाला भीष्म द्वादशी का दिन आशीर्वाद प्राप्त करने, आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करने और अपने पूर्वजों को प्रसन्न करने का अवसर प्रदान करता है।
पौराणिक कथाएँ:
भीष्म द्वादशी की जड़ें महाभारत से जुड़ी हैं। महाभारत युद्ध के बाद, पांडवों के दादा, भीष्म, बाणों की शय्या पर घायल होकर लेटे हुए थे। उन्होंने स्वर्गारोहण से पहले सूर्य के उत्तरायण (उत्तर दिशा की ओर जाना) होने का इंतजार करने का व्रत लिया। यह अवधि माघ मास के साथ मेल खाती थी, जिससे इस मास में आने वाली द्वादशी तिथि महत्वपूर्ण हो गई। इस दौरान उन्होंने युधिष्ठिर को अमूल्य ज्ञान और शिक्षा प्रदान की, जिससे उनकी सम्मानित भूमिका कायम हुई।
आध्यात्मिक महत्व:
भीष्म द्वादशी हमारे पूर्वजों को सम्मान देने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के महत्व को दर्शाता है। माना जाता है कि इस दिन पूजा-पाठ और तर्पण करने से हम उनकी आत्मा को प्रसन्न करते हैं और उनके प्रति अपने कर्तव्य को पूरा करते हैं। इससे हमारे जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है। इसके अलावा, भीष्म द्वादशी भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने और मोक्ष (जन्म-मृत्यु चक्र से मुक्ति) प्राप्त करने से जुड़ी है। यह दिन आध्यात्मिक प्रगति करने और धार्मिक जीवन जीने का प्रयास करने की याद दिलाता है।
व्रत का पालन:
भीष्म द्वादशी का व्रत रखने वाले भक्त कठोर नियमों का पालन करते हैं। वे आमतौर पर जल्दी उठते हैं, स्नान करते हैं और साफ कपड़े पहनते हैं। पूजा स्थल को पवित्र जल से सजाया जाता है और देवताओं का आह्वान किया जाता है। भगवान विष्णु और पितरों को फूल, अगरबत्ती और दीप अर्पित किए जाते हैं। उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए मंत्रों का जाप किया जाता है। पूरे दिन, श्रद्धालु कठोर उपवास रखते हैं, केवल फलों और जल का ही सेवन करते हैं। कुछ लोग अनाज और नमक से भी पूरी तरह परहेज करते हैं। शाम को फिर से पूजा की जाती है और भजन-कीर्तन होता है। अगले दिन, निर्धारित अनुष्ठानों के बाद व्रत का पारण किया जाता है।
भीष्म द्वादशी पालन के लाभ:
माना जाता है कि भीष्म द्वादशी का पालन करने से आध्यात्मिक और सांसारिक दोनों तरह के कई लाभ मिलते हैं। यहाँ कुछ महत्वपूर्ण लाभ दिए गए हैं:
- मोक्ष की प्राप्ति: इस दिन ईमानदारी से अनुष्ठान और प्रार्थना करने से माना जाता है कि जन्म-मृत्यु चक्र टूट जाता है और मोक्ष की ओर अग्रसर हो जाते हैं।
- पूर्वजों को प्रसन्न करना: तर्पण और अनुष्ठान से पितरों को प्रसन्नता मिलती है, उनकी आत्मा को शांति मिलती है और परिवार के लिए उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।
- आध्यात्मिक उत्थान: उपवास और आध्यात्मिक क्रियाएं मन और शरीर को शुद्ध करती हैं, जिससे आंतरिक शांति और आध्यात्मिक विकास की भावना पैदा होती है।
- इच्छाओं की पूर्ति: माना जाता है कि सच्ची भक्ति और व्रत का पालन करने से आपकी धार्मिक इच्छाएँ पूरी होती हैं।
पूजा विधि:
- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें।
- घर में गंगाजल छिड़ककर पूजा स्थान को साफ करें।
- भगवान विष्णु और पितरों की प्रतिमा स्थापित करें।
- दीप प्रज्वलित करें और धूप-दीप अर्पित करें।
- भगवान विष्णु और पितरों का षोडशोपचार पूजन करें।
- व्रत कथा पढ़ें और आरती करें।
- दिन भर उपवास रखें और ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- शाम को सूर्यास्त के बाद भगवान विष्णु और पितरों की आरती करें।
- अगले दिन सुबह स्नान करके व्रत का पारण करें।