संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश को समर्पित एक महत्वपूर्ण व्रत है। यह हर महीने की कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है।
संकष्टी चतुर्थी व्रत का महत्व:
- संकटों का नाश: मान्यता है कि संकष्टी चतुर्थी व्रत रखने से भगवान गणेश सभी कष्टों और बाधाओं को दूर करते हैं।
- मनोकामना पूर्ति: इस व्रत को रखने से भगवान गणेश भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।
- विवाह में बाधा: यदि विवाह में कोई बाधा आ रही हो तो यह व्रत विवाह की बाधा को दूर करने में सहायक होता है।
- संतान प्राप्ति: संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले लोगों के लिए भी यह व्रत बहुत लाभदायक माना जाता है।
संकष्टी चतुर्थी व्रत की विधि:
- व्रत की तैयारी: व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें।
- पूजा: गणेश जी की मूर्ति स्थापित करें और फल, फूल, मिठाई, धूप, दीप आदि से उनका पूजन करें।
- व्रत: पूजा के बाद व्रत का संकल्प लें और दिन भर उपवास रखें।
- कथा: शाम को संकष्टी चतुर्थी व्रत की कथा सुनें।
- चंद्र दर्शन: चंद्रमा को अर्घ्य दें और चंद्र दर्शन के बाद ही व्रत खोलें।
संकष्टी चतुर्थी व्रत की कथा:
एक बार माता पार्वती ने गणेश जी से पूछा कि कौन सा व्रत सबसे सरल और फलदायी है। तब गणेश जी ने उन्हें संकष्टी चतुर्थी व्रत की कथा सुनाई।
कथा के अनुसार, एक बार एक गरीब ब्राह्मणी थी जिसके घर में बहुत कष्ट थे। एक दिन उसने संकष्टी चतुर्थी व्रत रखा और भगवान गणेश की पूजा की। भगवान गणेश उसकी भक्ति से प्रसन्न हुए और उसके सभी कष्टों को दूर कर दिया।
तब से यह व्रत बहुत लोकप्रिय हो गया और लोग इसे भगवान गणेश की कृपा प्राप्त करने के लिए रखने लगे।
संकष्टी चतुर्थी व्रत के कुछ महत्वपूर्ण नियम:
- व्रत के दिन सिर्फ एक बार ही भोजन करना चाहिए।
- व्रत के दौरान तामसिक भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए।
- व्रत के दिन झूठ नहीं बोलना चाहिए और क्रोध नहीं करना चाहिए।
- व्रत के दिन दान-पुण्य करना चाहिए।
संकष्टी चतुर्थी व्रत एक सरल और फलदायी व्रत है। यह व्रत रखने से भगवान गणेश की कृपा प्राप्त होती है और सभी कष्टों का नाश होता है।